राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में “दवा उपलब्ध नहीं है” का बहाना बनाकर मरीजों को निजी मेडिकल स्टोर्स पर भेजने वाले डॉक्टर्स और अस्पताल प्रशासन पर अब गाज गिरना तय है। जनवरी 2026 की शुरुआत के साथ ही चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा निदेशालय ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि नि:शुल्क दवा योजना का लाभ मरीज को नहीं मिला, तो जिम्मेदारी डॉक्टर और अस्पताल प्रभारी की होगी।
सीधी बात: “दवा नहीं है” तो खरीदकर देनी होगी आम मरीज अक्सर यह नहीं जानता कि अस्पताल में दवा खत्म होने पर भी उसे बाहर से खरीदने की जरूरत नहीं है। सरकार के ‘राजस्थान मेडिकल रिलीफ सोसायटी’ (RMRS) के नियमों के मुताबिक, अगर डॉक्टर द्वारा लिखी गई कोई आवश्यक दवा (EDL) स्टॉक में नहीं है, तो अस्पताल प्रशासन को उसे ‘लोकल परचेज’ (Local Purchase) के बजट से तुरंत खरीदकर मरीज को मुफ्त देना अनिवार्य है।
बावजूद इसके, धरातल पर डॉक्टर मरीज के हाथ में सादी पर्ची थमा देते हैं। इसी मनमानी को रोकने के लिए जन स्वास्थ्य निदेशक डॉ. रवि प्रकाश शर्मा और विभाग के आला अधिकारियों ने सख्त निर्देश जारी किए हैं कि किसी भी सूरत में मरीज की जेब से पैसा खर्च नहीं होना चाहिए ।
जनवरी 2026: अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई सरकार ने केवल निर्देश नहीं दिए, बल्कि डंडा भी चला दिया है। हाल ही में हुई समीक्षा बैठकों और औचक निरीक्षणों के बाद विभाग ने कड़े कदम उठाए हैं:
- डॉक्टर्स और स्टाफ सस्पेंड: आरजीएचएस (RGHS) और नि:शुल्क दवा योजना में गड़बड़ी करने और बाहर की दवा लिखने/फर्जी क्लेम उठाने के मामलों में 9 से अधिक कार्मिकों (जिनमें 3 एलोपैथी और 2 आयुर्वेद डॉक्टर शामिल हैं) को निलंबित किया गया है ।
- स्टोर्स पर एफआईआर: जयपुर और भीलवाड़ा सहित कई जिलों में मिलीभगत कर दवा बेचने वाले मेडिकल स्टोर्स (जैसे हरिकृष्णा और सांवरिया फार्मा) के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है और उनके लाइसेंस रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
- EDL की बाध्यता: सभी सीएमएचओ (CMHO) और पीएमओ (PMO) को निर्देश दिए गए हैं कि डॉक्टर्स केवल आवश्यक दवा सूची (EDL) में शामिल 1331 प्रकार की दवाइयां ही लिखें। यदि कोई डॉक्टर ब्रांडेड दवा लिखता है, तो उसके खिलाफ राजस्थान सिविल सेवा नियमों (Rule 16/17) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी।
मरीज क्या करें? यह है आपका अधिकार अगर आप सरकारी अस्पताल जाएं और डॉक्टर बाहर की दवा लिखे या फार्मासिस्ट कहे कि “दवा खत्म है, बाहर से ले लो,” तो आप ये कदम उठाएं:
- मांग करें: अस्पताल प्रभारी (PMO/Superintendent) से तुरंत संपर्क करें और ‘लोकल परचेज’ के तहत दवा उपलब्ध कराने की मांग करें।
- 181 पर कॉल करें: मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 पर मौके से ही शिकायत दर्ज कराएं। सरकार ने इस हेल्पलाइन पर आने वाली दवा संबंधी शिकायतों के निस्तारण को प्राथमिकता पर रखा है ।
सरकार की मंशा साफ है—सरकारी अस्पताल में इलाज का मतलब है ‘पूर्णतः नि:शुल्क’। अगर डॉक्टर कमीशन के लालच में या अस्पताल प्रशासन सुस्ती के कारण मरीज को बाहर भेजता है, तो अब उनकी जवाबदेही तय होगी। यह आदेश न केवल कागजों में है, बल्कि जनवरी माह की ताबड़तोड़ कार्रवाइयों ने इसे हकीकत में बदल दिया है।
