राजस्थान

ओरण भूमि विवाद: भजनलाल सरकार के फैसले पर भाजपा नेता की चेतावनी, ‘प्राण त्याग दूंगा’

ओरण भूमि (Oran Land) राजस्थान की संस्कृति और पारिस्थितिकी का वह अभिन्न अंग है, जिसे लेकर आज पूरा पश्चिमी राजस्थान सुलग रहा है। राज्य की भजनलाल शर्मा सरकार द्वारा जैसलमेर जिले में हजारों बीघा जमीन को संरक्षित करने का ऐतिहासिक फैसला भी स्थानीय आक्रोश को शांत नहीं कर पाया है। स्थिति तब और विस्फोटक हो गई जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ही कद्दावर नेता और सामाजिक कार्यकर्ता वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने अपनी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए “प्राण त्यागने” तक का अल्टीमेटम दे दिया।

आखिर सरकार के फैसले के बाद भी ओरण भूमि का मुद्दा शांत क्यों नहीं हो रहा? क्यों 725 किलोमीटर की पदयात्रा निकाली जा रही है? इस विस्तृत रिपोर्ट में हम इस पूरे विवाद की हर परत को खोलेंगे।

भजनलाल सरकार का बड़ा फैसला: 17,561 बीघा भूमि आरक्षित

जनवरी 2026 में बढ़ते दबाव और आंदोलन को देखते हुए, राजस्थान सरकार ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम उठाया। जैसलमेर जिला प्रशासन और राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर 17,561 बीघा भूमि को ओरण के रूप में मान्यता दी है। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है ।   

सरकार द्वारा अधिसूचित की गई प्रमुख ओरण भूमि का विवरण इस प्रकार है:

  1. देगराय ओरण (भीमसर): यहाँ 5,882 बीघा भूमि को सुरक्षित किया गया है। यह क्षेत्र गोडावण पक्षी के लिए महत्वपूर्ण है।
  2. आलाजी ओरण (दिलावर और कुछड़ी): 7,473 बीघा भूमि आरक्षित की गई है, जो इस फैसले का सबसे बड़ा हिस्सा है।
  3. स्वांगिया माता ओरण (पूनमनगर): 3,607 बीघा भूमि को मान्यता मिली है।
  4. बिंजोता ओरण: 597 बीघा भूमि को सुरक्षित किया गया है।

अपनी ही सरकार के खिलाफ भाजपा नेता का ‘आत्म-बलिदान’ का प्रण

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब भाजपा नेता वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने एक वीडियो जारी कर सरकार को चेताया। सोलंकी, जो ह्रदय रोग (Heart Disease) से पीड़ित होने के कारण शारीरिक रूप से पदयात्रा में शामिल नहीं हो सकते, ने स्पष्ट कहा कि प्रशासन ने पहले भी तीन महीने में ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने का लिखित आश्वासन देकर धरना समाप्त करवाया था, लेकिन वह वादा पूरा नहीं हुआ ।   

सोलंकी ने अपनी चेतावनी को तीन चरणों में विभाजित किया है, जो प्रशासन के लिए खतरे की घंटी है:

  • भूख हड़ताल: यदि पर्यावरण प्रेमियों की पदयात्रा के जोधपुर सीमा में प्रवेश करने तक मांगें नहीं मानी गईं, तो वे भूख हड़ताल पर बैठेंगे।
  • जल त्याग: यदि इसके बाद भी सरकार नहीं जागी और यात्रा जयपुर की ओर बढ़ती रही, तो वे जल का त्याग कर देंगे।
  • प्राण त्याग: उन्होंने भावुक होकर कहा, “यदि आंदोलनकारी जयपुर पहुँचते हैं और फिर भी सरकार ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं करती, तो ज़रूरत पड़ी तो मैं अपने प्राण भी त्याग दूंगा”

ओरण बचाओ यात्रा: 725 किलोमीटर का संघर्ष

सरकार की ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ (Deemed Forest) नीति और राजस्व रिकॉर्ड में देरी के खिलाफ जैसलमेर के तनोट माता मंदिर से एक विशाल पदयात्रा शुरू हुई है। सुमेर सिंह भाटी और अन्य पर्यावरणविदों के नेतृत्व में ग्रामीण कड़ाके की ठण्ड में नंगे पैर जयपुर की ओर बढ़ रहे हैं। लगभग 725 किलोमीटर की यह यात्रा केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि ओरण भूमि को बचाने के लिए एक जन-आंदोलन बन चुकी है ।   

विवाद की असली जड़: राजस्व रिकॉर्ड बनाम वन विभाग

आम जनता के मन में सवाल है कि जब सरकार ने जमीन आरक्षित कर दी है, तो विरोध क्यों? इसका उत्तर तकनीकी है। ग्रामीण और आंदोलनकारी चाहते हैं कि ओरण भूमि को ‘राजस्व रिकॉर्ड’ में दर्ज किया जाए, जबकि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार इसे ‘वन’ (Deemed Forest) मानने की दिशा में बढ़ रही है।

  • ग्रामीणों का डर: यदि यह जमीन वन विभाग के अधीन चली गई, तो ग्रामीणों के पारंपरिक अधिकार (पशु चराना, लकड़ी बीनना, मेलों का आयोजन) समाप्त हो सकते हैं।
  • सौर ऊर्जा का खतरा: ग्रामीणों का आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन ‘बंजर’ या ‘सिवाय चक’ दर्ज है, जिसका फायदा उठाकर इसे सौर ऊर्जा कंपनियों को आवंटित कर दिया जाता है, जिससे खेजड़ी के पेड़ और गोडावण के आवास नष्ट हो रहे हैं ।

ओरण भूमि का पारिस्थितिक महत्व

पश्चिमी राजस्थान में ओरण भूमि केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह एक जीवन शैली है।

  • गोडावण (Great Indian Bustard): यह गंभीर रूप से लुप्तप्राय पक्षी इन्हीं ओरणों में प्रजनन करता है। हाई-टेंशन लाइनों और सौर पैनलों के जाल ने इनके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
  • जल संरक्षण: ओरण पारंपरिक जल स्रोतों (नाडी, तालाब) के जलग्रहण क्षेत्र होते हैं। यदि यहाँ निर्माण कार्य हुआ, तो रेगिस्तान में पानी का संकट गहरा जाएगा।
  • खेजड़ी और जैव विविधता: ओरण में पेड़ों को काटना धार्मिक रूप से वर्जित है, जिससे यहाँ अद्भुत जैव विविधता बची हुई है।

निष्कर्ष: सरकार के सामने आगे की राह

भजनलाल सरकार द्वारा 17,561 बीघा ओरण भूमि को सुरक्षित करना निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन यह समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है। पूरे राजस्थान में लगभग 25,000 ओरण हैं और लाखों बीघा जमीन अभी भी असुरक्षित है। भाजपा नेता वीरेंद्र सिंह सोलंकी का अल्टीमेटम और जयपुर कूच करती भीड़ यह संकेत दे रही है कि सरकार को नौकरशाही के पेंच से बाहर निकलकर जन-भावनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना होगा। यदि समय रहते ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में सही दर्जा नहीं मिला, तो यह आंदोलन राज्य सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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