गिस्तान की तपती रेत आज जोश और जुनून से उबल रही है। राजस्थान के राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ को बचाने के लिए खेजड़ी बचाओ आंदोलन बीकानेर ने आज एक ऐतिहासिक महासंग्राम का रूप ले लिया है। “सिर साठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण” के नारे के साथ बिश्नोई समाज और सर्व समाज के करीब 50,000 से 1,00,000 लोग बीकानेर की सड़कों पर उतर आए हैं ।
यह आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी उस विरासत की रक्षा का संकल्प है, जिसके लिए 1730 में अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 लोगों ने अपना बलिदान दिया था । आज बीकानेर का महापड़ाव इसी गौरवशाली इतिहास की आधुनिक गूँज है।
आज खेजड़ी बचाओ आंदोलन बीकानेर के समर्थन में पूरा शहर थम गया। सट्टा बाजार, केईएम रोड और कोटगेट जैसे प्रमुख व्यापारिक क्षेत्रों में सन्नाटा पसरा रहा, क्योंकि सभी व्यापारिक संगठनों ने महापड़ाव को अपना पूर्ण समर्थन दिया है । प्रशासन ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शहरी क्षेत्र के सरकारी और निजी स्कूलों में आधे दिन की छुट्टी घोषित कर दी है ताकि सुरक्षा और यातायात व्यवस्था बनी रहे ।
आंदोलनकारियों का सीधा आरोप सोलर कंपनियों पर है। पश्चिमी राजस्थान, विशेषकर बीकानेर में सोलर ऊर्जा के विस्तार के नाम पर लाखों खेजड़ी के पेड़ों की बलि दी जा रही है ।
इस महापड़ाव में केवल बिश्नोई समाज ही नहीं, बल्कि ’36 कौम’ के लोग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं ।
सुबह 11 बजे पॉलिटेक्निक कॉलेज से शुरू हुई विशाल रैली कलेक्ट्रेट पहुंची, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने जमकर नारेबाजी की । कार्यक्रम के अनुसार:
खेजड़ी (Prosopis cineraria) केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह रेगिस्तान की जैविक धुरी है ।
खेजड़ी बचाओ आंदोलन बीकानेर की मुख्य मांगें कानून में बदलाव को लेकर हैं:
खेजड़ी बचाओ आंदोलन बीकानेर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ‘ग्रीन एनर्जी’ के नाम पर ‘हरियाली’ की बलि नहीं दी जा सकती। यह आंदोलन भारत के पर्यावरण नीति निर्धारण में एक मील का पत्थर साबित होगा। बीकानेर की सड़कों पर मौजूद जनसैलाब का संदेश साफ है: “गर्दन कटा सकते हैं, पर खेजड़ी नहीं कटने देंगे” ।
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