बीकानेर

खेजड़ी बचाओ आंदोलन: बीकानेर में अनशन खत्म लेकिन धरना जारी, जानें 7 फरवरी का पूरा अपडेट और ट्री एक्ट की मांग

खेजड़ी बचाओ आंदोलन (Khejri Bachao Andolan) ने पिछले एक सप्ताह में राजस्थान की राजनीति और सामाजिक चेतना को झकझोर कर रख दिया है। पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर संभाग में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर हो रही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के विरोध में शुरू हुआ यह आंदोलन अब केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक ऐतिहासिक मुहिम बन चुका है। आज, 7 फरवरी को इस आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है जब सरकार के लिखित आश्वासन के बाद भूख हड़ताल (अनशन) को स्थगित कर दिया गया है, लेकिन आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक पूरे राज्य में कड़ा कानून लागू नहीं होता, उनका सत्याग्रह जारी रहेगा।

खेजड़ी बचाओ आंदोलन की वर्तमान स्थिति (7 फरवरी 2026)

7 फरवरी की सुबह खेजड़ी बचाओ आंदोलन के धरना स्थल, बीकानेर कलेक्ट्रेट पर माहौल थोड़ा बदला हुआ नजर आया। पिछले चार दिनों से आमरण अनशन पर बैठे 500 से अधिक संतों और पर्यावरण प्रेमियों ने 6 फरवरी की देर रात सरकार के प्रतिनिधियों से मिले लिखित आश्वासन के बाद अपना अनशन तोड़ दिया है।

हालांकि, खेजड़ी बचाओ आंदोलन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। आंदोलन का नेतृत्व कर रही ‘पर्यावरण संघर्ष समिति’ ने घोषणा की है कि उनका “महापड़ाव” (विशाल धरना) तब तक जारी रहेगा जब तक कि राजस्थान विधानसभा में “वृक्ष संरक्षण अधिनियम” (Tree Protection Act) पारित नहीं हो जाता और उसे पूरे प्रदेश में लागू नहीं कर दिया जाता।

सरकार का यू-टर्न और आंशिक जीत

इस आंदोलन की सबसे बड़ी जीत यह रही कि राज्य सरकार को झुकना पड़ा। 6 फरवरी को मंत्री के.के. विश्नोई और जीव जंतु कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष जसवंत विश्नोई धरना स्थल पर पहुंचे। उन्होंने आंदोलनकारियों को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का संदेश दिया और जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया।

सरकार ने तत्काल प्रभाव से एक आदेश जारी किया है जिसके तहत जोधपुर और बीकानेर संभाग में खेजड़ी के पेड़ों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। लेकिन खेजड़ी बचाओ आंदोलन के नेताओं का कहना है कि यह “आंशिक जीत” है। उनकी मांग है कि चूंकि खेजड़ी राजस्थान का ‘राज्य वृक्ष’ (State Tree) है, इसलिए यह प्रतिबंध केवल दो संभागों तक सीमित न होकर पूरे 50 जिलों में लागू होना चाहिए।

खेजड़ी बचाओ आंदोलन: संघर्ष की पूरी टाइमलाइन

इस ऐतिहासिक खेजड़ी बचाओ आंदोलन को समझने के लिए पिछले एक हफ्ते के घटनाक्रम पर नज़र डालना ज़रूरी है:

  1. 2 फरवरी (महापड़ाव का आगाज): बीकानेर कलेक्ट्रेट पर हज़ारों की संख्या में लोग एकत्र हुए। 1730 के ऐतिहासिक खेजड़ली बलिदान की याद में 363 लोगों ने आमरण अनशन शुरू किया।
  2. 3-4 फरवरी (आंदोलन का विस्तार): बीकानेर के बाज़ार बंद रहे। स्कूलों में छुट्टियां घोषित कर दी गईं। आंदोलन में महिलाओं और बच्चों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया।
  3. 5 फरवरी (विधानसभा में गूंज): मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने विधानसभा में आश्वासन दिया कि उनकी सरकार खेजड़ी को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है और जल्द ही कानून का मसौदा लाएगी।
  4. 6 फरवरी (नाटकीय मोड़): सरकार ने दो संभागों में कटाई पर रोक लगाई। पहले आंदोलनकारियों ने इसे खारिज किया, लेकिन देर रात लिखित आश्वासन और मंत्री के मान-मनौव्वल के बाद अनशन समाप्त करने पर सहमति बनी।
  5. 7 फरवरी (धरना जारी): अनशन खत्म हो गया है, लेकिन कलेक्ट्रेट पर धरना जारी है। मांग है- “समझौता नहीं, पूरा कानून चाहिए।”

खेजड़ी बचाओ आंदोलन की मुख्य मांगें

खेजड़ी बचाओ आंदोलन केवल एक पेड़ को बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह मरुस्थल के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को बचाने की जिद है। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

  • राज्यव्यापी ट्री प्रोटेक्शन एक्ट: सरकार तुरंत प्रभाव से एक ऐसा कानून बनाए जो पूरे राजस्थान में खेजड़ी और अन्य देसी प्रजातियों के पेड़ों की कटाई को प्रतिबंधित करे।
  • गैर-जमानती अपराध: पेड़ों की अवैध कटाई को गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखा जाए और दोषियों पर भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान हो।
  • सौर ऊर्जा कंपनियों पर लगाम: खेजड़ी बचाओ आंदोलन का मुख्य आरोप सौर ऊर्जा कंपनियों पर है। मांग है कि सौर पैनल लगाने के लिए ओरण (पवित्र वन) और गोचर भूमि का अधिग्रहण रद्द किया जाए।
  • अधिकारियों की जवाबदेही: जिन अधिकारियों की देखरेख में अब तक हज़ारों पेड़ काटे गए हैं, उनके खिलाफ सख्त विभागीय जांच और कार्रवाई हो।

राजनीति और खेजड़ी बचाओ आंदोलन

राजस्थान की राजनीति में खेजड़ी बचाओ आंदोलन ने भूचाल ला दिया है। यह मुद्दा अब पक्ष और विपक्ष की राजनीति से ऊपर उठ चुका है।

  • पूर्व सीएम वसुंधरा राजे का समर्थन: भाजपा की वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपनी ही पार्टी की सरकार के दौरान हो रहे इस आंदोलन का खुला समर्थन किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर खेजड़ी पूजन की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि “हम पेड़ों की पूजा करते हैं, उन्हें काटते नहीं” ।
  • विपक्ष का हमला: कांग्रेस और आरएलपी (RLP) ने भी इस मुद्दे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हनुमान बेनीवाल और रविंद्र सिंह भाटी जैसे नेताओं ने खेजड़ी बचाओ आंदोलन के मंच से सरकार को चेतावनी दी कि यदि युवाओं और किसानों की बात नहीं सुनी गई, तो विधानसभा का घेराव किया जाएगा।

सौर ऊर्जा बनाम पर्यावरण: एक गहराता संकट

खेजड़ी बचाओ आंदोलन ने विकास के मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पश्चिमी राजस्थान, जिसे भारत का “सोलर हब” बनाने की योजना है, वहां सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए विशाल भू-भाग की आवश्यकता है।

कंपनियां रातों-रात हज़ारों पेड़ों को जेसीबी मशीनों से उखाड़ रही हैं। विश्नोई समाज, जो प्रकृति संरक्षण के लिए जाना जाता है, का कहना है कि “ग्रीन एनर्जी” (Green Energy) के नाम पर “ग्रीनरी” (Greenery) की हत्या की जा रही है। खेजड़ी बचाओ आंदोलन के तहत जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में बीकानेर, फलोदी और जैसलमेर में लाखों पेड़ों को नुकसान पहुँचाया गया है। आंदोलनकारियों का तर्क है कि सरकार को बंजर भूमि का उपयोग करना चाहिए, न कि उन जमीनों का जहाँ सदियों पुराने खेजड़ी के पेड़ खड़े हैं।

आगे की राह: क्या कानून बनेगा?

7 फरवरी तक की स्थिति यह है कि खेजड़ी बचाओ आंदोलन ने सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने विधानसभा में घोषणा की है कि कानून बनाने की प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने कहा, “खेजड़ी हमारा कल्पवृक्ष है और हम इसका संरक्षण करेंगे।”

विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी बजट सत्र में सरकार ‘राजस्थान वृक्ष संरक्षण विधेयक 2026’ पेश कर सकती है। यदि ऐसा होता है, तो यह खेजड़ी बचाओ आंदोलन की ऐतिहासिक जीत होगी। लेकिन जब तक यह कानून धरातल पर नहीं आता, बीकानेर कलेक्ट्रेट पर बैठे आंदोलनकारी घर लौटने को तैयार नहीं हैं।

खेजड़ी बचाओ आंदोलन ने साबित कर दिया है कि जनशक्ति के आगे सत्ता को झुकना पड़ता है। यह आंदोलन केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक नजीर है कि कैसे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। 7 फरवरी का दिन इस आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दर्ज किया जाएगा, जब सत्याग्रह की जीत हुई और सरकार को लिखित में झुकना पड़ा।

अब सबकी निगाहें जयपुर विधानसभा पर टिकी हैं—क्या सरकार अपना वादा निभाएगी, या खेजड़ी बचाओ आंदोलन फिर से उग्र रूप लेगा?

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