बीकानेर खेजड़ी बचाओ आंदोलन वर्तमान में राजस्थान के सबसे बड़े जन-आंदोलनों में से एक बन गया है। फरवरी 2026 की शुरुआत में, बीकानेर कलेक्ट्रेट के बाहर एक अभूतपूर्व दृश्य देखा गया जहाँ पर्यावरण संरक्षण की मांग को लेकर ‘आर-पार’ की लड़ाई शुरू हो गई है । इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य राजस्थान के राज्य वृक्ष खेजड़ी को सौर ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर होने वाली अंधाधुंध कटाई से बचाना है।
सोमवार, 2 फरवरी 2026 को बीकानेर में आयोजित महापड़ाव के बाद यह आंदोलन और भी उग्र हो गया है । प्रशासन की उदासीनता और सौर कंपनियों की कार्यप्रणाली के विरुद्ध अब जनता सीधे मैदान में उतर चुकी है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका अनुशासित और समर्पित स्वरूप है। बीकानेर खेजड़ी बचाओ आंदोलन के तहत वर्तमान में निम्नलिखित प्रमुख घटनाक्रम हो रहे हैं:
बीकानेर खेजड़ी बचाओ आंदोलन का मुख्य कारण हरित ऊर्जा के नाम पर हो रहा पारिस्थितिक विनाश है।
पर्यावरण वैज्ञानिकों और स्थानीय कार्यकर्ताओं के अनुसार, सौर संयंत्रों की स्थापना के लिए बीकानेर जिले में पिछले 14 वर्षों में लगभग 5,00,000 पेड़ काटे जा चुके हैं । पूरे पश्चिमी राजस्थान में यह संख्या 30 लाख से भी अधिक होने का अनुमान है ।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि सौर कंपनियां सबूत मिटाने के लिए रात में पेड़ों को उखाड़ती हैं और उन्हें जमीन में दफना देती हैं या जला देती हैं । उदाहरण के लिए, बीकानेर के लखासर गाँव में जुलाई 2025 में एक ही दिन में 400 खेजड़ी के पेड़ काट दिए गए थे । मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए यह ‘पारिस्थितिक आत्महत्या’ के समान है ।
बीकानेर खेजड़ी बचाओ आंदोलन को राज्य के प्रमुख राजनेताओं का समर्थन प्राप्त हुआ है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ा है:
बीकानेर खेजड़ी बचाओ आंदोलन की मांगें केवल मौखिक आश्वासनों तक सीमित नहीं हैं, वे कानूनी बदलाव चाहते हैं:
आंदोलन के बढ़ते दबाव के बीच, संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने घोषणा की है कि सरकार वर्तमान विधानसभा सत्र में वृक्ष संरक्षण के लिए एक नया विधेयक (Draft Bill 2026) लाएगी。 इसके तहत जुर्माने को दस गुना बढ़ाने और हर एक पेड़ के बदले 10 नए पेड़ लगाने का प्रावधान प्रस्तावित है。 हालांकि, आंदोलनकारी केवल लिखित गारंटी और अधिनियम के लागू होने पर ही अनशन समाप्त करने की बात कर रहे हैं ।
बीकानेर खेजड़ी बचाओ आंदोलन आज न केवल पेड़ों को बचाने की मुहिम है, बल्कि यह मरुस्थल की संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित करने का संघर्ष है। 500 अनशनकारियों का यह संकल्प राजस्थान सरकार के लिए एक बड़ी परीक्षा है कि वह ‘ग्रीन एनर्जी’ और ‘ग्रीन इकोलॉजी’ के बीच कैसे संतुलन बनाती है।
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