राजस्थान

अजमेर दरगाह विवाद: हिंदू मंदिर दावे पर सिविल कोर्ट में सुनवाई, अगली तारीख 6 सितंबर 2025

अजमेर : विश्व प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की अजमेर दरगाह को हिंदू मंदिर बताने वाले दावे से जुड़े मामले में शनिवार को अजमेर सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट (पश्चिम) मनमोहन चंदेल की अदालत में सुनवाई हुई। इस दौरान हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता और भाजपा से निष्कासित पूर्व विधायक ज्ञानदेव आहूजा कोर्ट में मौजूद रहे। दरगाह खादिमों की संस्था अंजुमन सैयद जादगान के सचिव सैयद सरवर चिश्ती सहित अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित थे।

प्रार्थना पत्रों पर हुई गहन बहस

सुनवाई के दौरान दो प्रार्थना पत्रों पर चर्चा हुई। पहला प्रार्थना पत्र अल्पसंख्यक मामलात विभाग और दूसरा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से प्रस्तुत किया गया। दोनों पक्षों ने अपने प्रार्थना पत्र सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के रूल 7/10 के तहत दायर किए। एएसआई और अल्पसंख्यक विभाग ने दलील दी कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में खामियां थीं और नोटिस की समयसीमा भी अनुचित थी।

वादी विष्णु गुप्ता के अधिवक्ता संदीप कुमार ने जवाब में तर्क दिया कि नोटिस की प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी। उन्होंने कहा कि नियमों के अनुसार नोटिस दो महीने पहले जारी किया जाना चाहिए, न कि साल भर पहले, जैसा कि प्रतिवादी पक्ष ने दावा किया।

दरगाह कमेटी की दलील खारिज

दरगाह कमेटी ने भी एक प्रार्थना पत्र दायर कर अपनी बात रखने की मांग की, लेकिन अदालत ने उनकी दलील को सुनने से इनकार कर दिया। इस बीच, कोर्ट परिसर में सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त रही। गौरतलब है कि कुछ समय पहले विष्णु गुप्ता पर कथित तौर पर फायरिंग की घटना हुई थी, जिसके चलते पुलिस ने अतिरिक्त बल तैनात किया था।

मामले का आधार और विवाद

हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने अपनी याचिका में दावा किया है कि अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह के परिसर में पहले संकट मोचन महादेव मंदिर था। याचिका में ऐतिहासिक दस्तावेजों और 1911 में रिटायर्ड जज हरबिलास सारदा की किताब अजमेर: हिस्टॉरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव का हवाला दिया गया है। गुप्ता ने मांग की है कि दरगाह परिसर में पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी जाए और इसका सर्वे कराया जाए। दूसरी ओर, दरगाह कमेटी और खादिमों ने इस दावे का कड़ा विरोध करते हुए इसे सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश बताया है।

अगली सुनवाई 6 सितंबर को

सुबह प्रार्थना पत्रों पर बहस के बाद दोपहर में लंच ब्रेक के पश्चात सुनवाई फिर शुरू हुई। सभी पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 6 सितंबर 2025 की तारीख तय की। इस मामले ने स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक ध्यान खींचा है, क्योंकि यह धार्मिक और ऐतिहासिक संवेदनशीलता से जुड़ा है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह, जिसे गरीब नवाज की दरगाह के नाम से भी जाना जाता है, भारत के प्रमुख सूफी तीर्थ स्थलों में से एक है। यह दरगाह 13वीं सदी के सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मजार है, जो हिंदू, मुस्लिम और अन्य धर्मों के अनुयायियों के लिए आस्था का केंद्र है। इस विवाद ने न केवल धार्मिक भावनाओं को प्रभावित किया है, बल्कि सामाजिक सौहार्द पर भी सवाल उठाए हैं।

अदालत के अगले फैसले पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि यह मामला न केवल अजमेर बल्कि पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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