बीकानेर खेजड़ी आंदोलन (Bikaner Khejri Andolan) अब राजस्थान के पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में एक निर्णायक अध्याय बन चुका है। 13 फरवरी 2026 को, 11 दिनों के संघर्ष और 363 लोगों के आमरण अनशन के बाद, यह आंदोलन एक बड़ी जीत के साथ स्थगित हुआ। राज्य सरकार ने न केवल खेजड़ी की कटाई पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का लिखित आश्वासन दिया है, बल्कि विधानसभा के इसी सत्र में एक सख्त संरक्षण कानून लाने का वादा भी किया है।
यह रिपोर्ट आपको इस आंदोलन की गहराई, इसके कारणों और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण प्रदान करती है।
आंदोलन की पृष्ठभूमि: क्यों उबल पड़ा था थार?
बीकानेर खेजड़ी आंदोलन की जड़ें केवल कुछ पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं थीं, बल्कि यह सौर ऊर्जा (Solar Energy) के नाम पर हो रहे “इकोलॉजिकल मर्डर” के खिलाफ एक जन-विद्रोह था। राजस्थान का राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ (Prosopis cineraria), जिसे मरुस्थल का ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता है, पश्चिमी राजस्थान की जीवन रेखा है।
पिछले एक दशक में, राजस्थान ने सौर ऊर्जा उत्पादन में देश में शीर्ष स्थान हासिल किया है, लेकिन इसकी भारी कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ी है। महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर के प्रोफेसर अनिल छंगाणी के एक अध्ययन के अनुसार, पिछले 10-14 वर्षों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए पश्चिमी राजस्थान में लगभग 50 लाख (5 million) पेड़ काटे गए हैं। इनमें खेजड़ी के अलावा रोहिड़ा, केर और बेर जैसे मरुस्थलीय पौधे भी शामिल हैं।
बिश्नोई समाज और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप था कि ‘ग्रीन एनर्जी’ के नाम पर कंपनियां रात के अंधेरे में जेसीबी और पेट्रोल-संचालित आरी (Hacksaws) का उपयोग करके हजारों पेड़ों को काट रही हैं और सबूत मिटाने के लिए उन्हें जमीन में दफना रही हैं। इसी आक्रोश ने फरवरी 2026 में एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया।
Rajasthan Budget 2026: भजनलाल सरकार ने खोला खुशियों का पिटारा, 1.5 लाख सरकारी नौकरियों के साथ बदला राजस्थान का इतिहास
आंदोलन का घटनाक्रम: 2 फरवरी से 13 फरवरी 2026 तक
बीकानेर खेजड़ी आंदोलन की शुरुआत 2 फरवरी 2026 को बीकानेर कलेक्ट्रेट पर एक विशाल ‘महापड़ाव’ के साथ हुई। आइए नजर डालते हैं प्रमुख घटनाओं पर:
1. महापड़ाव और ऐतिहासिक अनशन (2-4 फरवरी)
2 फरवरी को हजारों की संख्या में लोग पॉलीटेक्निक कॉलेज मैदान में एकत्र हुए। 3 फरवरी को आंदोलन ने तब गंभीर रूप ले लिया जब 363 लोगों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह संख्या प्रतीकात्मक थी—जो 1730 ईस्वी में जोधपुर के खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में पेड़ों को बचाने के लिए शहीद हुए 363 लोगों की याद दिलाती थी। संतों और महिलाओं ने कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे डेरा डाल दिया।
2. विधानसभा में गूंज (5-8 फरवरी)
आंदोलन की लपटें जयपुर विधानसभा तक पहुंचीं। 5 फरवरी को निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी और कांग्रेस विधायक डूंगर राम गेदर ने शून्यकाल में यह मुद्दा उठाया। सरकार पर दबाव इतना बढ़ा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सदन में घोषणा करनी पड़ी कि सरकार खेजड़ी संरक्षण के लिए कानून लाएगी। हालांकि, 6 फरवरी को मंत्री के.के. बिश्नोई द्वारा केवल बीकानेर और जोधपुर संभाग में कटाई पर रोक के प्रस्ताव को आंदोलनकारियों ने ठुकरा दिया। उनकी मांग स्पष्ट थी— “पूरे राजस्थान में रोक और लिखित आदेश।”
3. सरकार का झुकना और लिखित समझौता (12-13 फरवरी)
12 फरवरी की रात, सरकार और आंदोलनकारी संघर्ष समिति के बीच मैराथन वार्ता हुई। अंततः, सरकार ने प्रदर्शनकारियों की लगभग सभी प्रमुख मांगें मान लीं। राजस्व विभाग ने सभी जिला कलेक्टरों को एक सर्कुलर जारी कर निर्देशित किया कि जब तक नया कानून नहीं बनता, तब तक प्रदेश में एक भी खेजड़ी का पेड़ नहीं कटना चाहिए। 13 फरवरी की सुबह, स्वामी सच्चिदानंद आचार्य और संयोजक रामगोपाल बिश्नोई ने लिखित आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन को “स्थगित” करने की घोषणा की।
क्या है सरकार के लिखित आश्वासन में?
आंदोलनकारियों को मिले लिखित पत्र में सरकार ने तीन प्रमुख बिंदुओं पर सहमति जताई है, जो बीकानेर खेजड़ी आंदोलन की बड़ी सफलता मानी जा रही है:
- पूर्ण प्रतिबंध: राज्य भर में खेजड़ी के पेड़ों की कटाई पर तत्काल प्रभाव से रोक। यह रोक केवल वन भूमि पर ही नहीं, बल्कि राजस्व (Revenue) और निजी खेतों (Khatedari) पर भी लागू होगी।
- नया कानून (अमृता देवी एक्ट): सरकार ने वादा किया है कि बजट सत्र 2026-27 के दौरान ही एक विशेष विधेयक पेश किया जाएगा। आंदोलनकारियों की मांग है कि इस कानून का नाम ‘अमृता देवी बिश्नोई’ के नाम पर रखा जाए।
- 10% भूमि आरक्षण: राज्य के बजट में वित्त मंत्री दीया कुमारी ने घोषणा की है कि सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवंटित भूमि का 10% हिस्सा वृक्षारोपण के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य होगा। साथ ही, आगामी वर्ष में 10 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है।
कानूनी लड़ाई और NGT का हस्तक्षेप
इस आंदोलन को धार देने में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के हालिया आदेशों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘गणेशदान बीठू बनाम राजस्थान राज्य’ (OA 834/2024) मामले में, NGT ने अयाना रिन्यूएबल पावर (Ayana Renewable Power) जैसी कंपनियों द्वारा बिना अनुमति खेजड़ी काटने पर सख्त रुख अपनाया।
इससे पहले, ‘एम्प एनर्जी’ (Amp Energy) मामले में NGT ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आदेश दिया था कि काटे गए प्रत्येक पेड़ के बदले कंपनी को 10 गुना अधिक पौधे लगाने होंगे। साथ ही, ट्रिब्यूनल ने राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 के तहत मात्र 100 रुपये के जुर्माने को “नाकाफी” बताया था। यही कारण है कि अब नए कानून में प्रति पेड़ 1 लाख से 2 लाख रुपये तक के जुर्माने और 3 साल तक की सजा का प्रावधान करने की मांग की जा रही है।
सौर ऊर्जा कंपनियों की भूमिका और चुनौतियां
बीकानेर खेजड़ी आंदोलन ने सौर ऊर्जा कंपनियों की कार्यप्रणाली (Modus Operandi) पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बड़ी कंपनियां ‘व्हाइट कैटेगरी’ (White Category – प्रदूषण मुक्त उद्योग) के दर्जे का फायदा उठाती हैं। उन्हें पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) से छूट मिली हुई है, जिसका दुरुपयोग कर वे हजारों बीघा जमीन से वनस्पति को साफ कर देती हैं।
हालांकि, नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया (NSEFI) ने हाल ही में घोषणा की है कि वे सीएसआर फंड से 2028 तक 10 लाख खेजड़ी के पेड़ लगाएंगे। लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि 50 साल पुराने पेड़ को काटकर नया पौधा लगाना पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की भरपाई नहीं कर सकता, क्योंकि एक पूर्ण विकसित खेजड़ी का पेड़ रेगिस्तान में जैव-विविधता का केंद्र होता है।
निष्कर्ष: यह अंत नहीं, एक नई शुरुआत है
बीकानेर खेजड़ी आंदोलन का स्थगन केवल एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। आंदोलनकारी संतों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार द्वारा लाया गया कानून कमजोर हुआ या उसमें सौर कंपनियों के लिए कोई चोर-रास्ता छोड़ा गया, तो आंदोलन दोबारा और अधिक उग्र रूप में शुरू होगा।
यह आंदोलन विकास के उस मॉडल के खिलाफ एक चेतावनी है जो प्रकृति की कीमत पर खड़ा किया जा रहा है। राजस्थान ने दिखा दिया है कि “सिर साटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण” (अगर सिर कटाकर भी पेड़ बच जाए, तो यह सस्ता सौदा है) की 300 साल पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। अब सबकी निगाहें विधानसभा के बजट सत्र पर हैं, जहाँ राजस्थान के “ग्रीन फ्यूचर” का फैसला लिखा जाएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
- बीकानेर खेजड़ी आंदोलन का मुख्य कारण क्या था? सौर ऊर्जा कंपनियों द्वारा बीकानेर और पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ों की अवैध और अंधाधुंध कटाई।
- सरकार ने क्या आश्वासन दिया है? खेजड़ी की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध और इसी सत्र में सख्त कानून लाने का लिखित वादा।
- इस आंदोलन का नेतृत्व किसने किया? बिश्नोई समाज, संतों (जैसे स्वामी सच्चिदानंद) और पर्यावरण प्रेमियों ने सामूहिक रूप से इसका नेतृत्व किया।
ताजा खबरों और विशेष अपडेट के लिए हमसे जुड़ने के लिए हमारे व्हाट्सएप चैनल को अभी ज्वाइन करें। THAR TODAY RAJASTHAN
